दिल ना उमीद तो नहीं नाकाम ही तो है, लंबी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है - फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

हम पर तुम्हारी चाह का इल्ज़ाम ही तो है

हम पर तुम्हारी चाह का इल्ज़ाम ही तो है
दुश्नाम तो नहीं है ये इकराम ही तो है

करते हैं जिस पे तान कोई जुर्म तो नहीं
शौक़-ए-फ़ुज़ूल ओ उल्फ़त-ए-नाकाम ही तो है

दिल मुद्दई के हर्फ़-ए-मलामत से शाद है
ऐ जान-ए-जां ये हर्फ़ तेरा नाम ही तो है

दिल ना उमीद तो नहीं नाकाम ही तो है
लंबी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है

दस्त-ए-फ़लक में गर्दिश-ए-तक़दीर तो नहीं
दस्त-ए-फ़लक में गर्दिश-ए-अय्याम ही तो है

आख़िर तो एक रोज़ करेगी नज़र वफ़ा
वो यार-ए-ख़ुश-ख़िसाल सर-ए-बाम ही तो है

भीगी है रात 'फ़ैज़' ग़ज़ल इब्तिदा करो
वक़्त-ए-सरोद दर्द का हंगाम ही तो है

- फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ -


कठिन शब्दों के अर्थ

  • दुश्नाम: गाली, अपशब्द
  • इकराम: सम्मान, इज़्ज़त
  • तान: ताना, व्यंग्य
  • शौक़-ए-फ़ुज़ूल: व्यर्थ का शौक़ / बेकार का इश्क़
  • उल्फ़त-ए-नाकाम: असफल प्रेम
  • मुद्दई: विरोधी, शिकायत करने वाला
  • हर्फ़-ए-मलामत: निंदा या अपमान के शब्द
  • शाद: प्रसन्न, खुश
  • दस्त-ए-फ़लक: आकाश (भाग्य/नियति) के हाथ
  • गर्दिश-ए-अय्याम: समय का फेर, दिनों का उलटफेर
  • यार-ए-ख़ुश-ख़िसाल: अच्छे स्वभाव/गुणों वाला महबूब
  • सर-ए-बाम: छत पर
  • वक़्त-ए-सरोद: संगीत या गायन का समय
  • हंगाम: समय, दौर, अवसर
Whatsapp Support... Welcome to WhatsApp chat
Howdy! How can we help you today?
Join Channel...